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Showing posts from 2020

इमरान कुरैशी को 'सितारा-ए-इम्तिआज़' अवॉर्ड

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दुनिया के तमाम प्रमुख कला केंद्रों के साथ-साथ दिल्ली और मुंबई में कई मौकों पर समूह प्रदर्शनियों व एकल प्रदर्शनियों में अपना काम प्रदर्शित कर चुके पाकिस्तानी चित्रकार इमरान कुरैशी को पाकिस्तान के प्रतिष्ठित 'सितारा-ए-इम्तिआज़' अवॉर्ड से नवाज़ा गया है । पाकिस्तान के राष्ट्रपति डॉक्टर आरिफ अल्वी ने उन्हें अवॉर्ड दिया । दो वर्ष पहले, वर्ष 2018 में दिल्ली में आयोजित इंडिया ऑर्ट फेयर में एक पूरा बूथ उनके काम से सुसज्जित था, जिसे देखने का सुअवसर मुझे भी मिला था । इमरान को पाकिस्तान में मिनियेचर कला परंपरा को पुनर्जीवन देने का श्रेय दिया जाता है । उनके काम में प्राचीनता और आधुनिकता, परंपरा और समकालीनता, धार्मिकता और धर्मनिरपेक्षता के बीच संवाद के भाव जिस सहजता व प्रखरता से अभिव्यक्ति पाते महसूस होते हैं, वह कल्पनाशील सृजनात्मकता की नई उड़ानों से परिचित करवाते हैं । बड़े आकार और पृष्ठभूमि में किए गए इंस्टॉलेशंस में उन्होंने अभिनव प्रयोग किए हैं । माध्यम और विषयों को लेकर इमरान का चौकन्नापन तथा प्रयोगशीलता चकित करने वाली है । दिल्ली व मुंबई की कई नितांत निजी ऑर्ट गैलरीज के अलावा त्रिवेणी क

बेरूत में पोर्ट पर अमोनियम नाइट्रेट के एक गोदाम में हुए धमाके ने सिर्फ बेरूत के ही नहीं, बल्कि मध्य-पूर्व देशों के भी कला जगत को भी भारी नुकसान पहुँचाया है

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लेबनान की राजधानी बेरूत में पोर्ट पर  अमोनियम नाइट्रेट के एक गोदाम में हुए  धमाके से जान-माल के भारी नुकसान के साथ  कला जगत को भी बड़ी चोट पहुँची है ।  बेरूत चूँकि मध्य-पूर्व देशों के कलाकारों तथा वहाँ की ऑर्ट गैलरीज के लिए भी  एक प्रमुख केंद्र है, इसलिए धमाके से हुआ नुकसान  सिर्फ बेरूत के कला जगत का ही नहीं,  बल्कि मध्य-पूर्व देशों के कला जगत का भी नुकसान है ।  बेरूत के कई म्यूजियम्स तथा ऑर्ट गैलरीज उक्त धमाके की चपेट में आई हैं,  और उनकी इमारतों के साथ-साथ महत्त्वपूर्ण कलाकृतियों को नुकसान हुआ है ।  पोर्ट के नजदीक स्थित गैलरीज तो पूरी तरह तहस-नहस हो गई हैं ।  कुछेक गैलरीज के अधिकारी व कर्मचारी बुरी तरह घायल होने के कारण अस्पताल में हैं,  और इस वजह से उनके लिए यह देख पाना तक असंभव हुआ है कि  बचा क्या है और उसे कैसे सहेजा जा सकता है ।  बेरूत के सांस्कृतिक जीवन का पर्याय समझा जाने वाला  सुरसोक म्यूजियम,  जिसके नवीनीकरण पर अभी हाल ही में काफी रकम खर्च की गई थी,  बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ है ।  जानकारों के अनुसार, इस म्यूजियम को ऐसा नुकसान तो  गृहयुद्ध के दौरान भी नहीं हुआ था ।  अगले वर्ष आ

कला बाजार में जोरदार सफलता पाने वाले जितिश कल्लट तथा उनके जैसे कामयाब कलाकारों की कलाप्रेमियों के बीच वैसी पहचान और प्रतिष्ठा आखिर नहीं बन पाई है, जैसी पहचान व प्रतिष्ठा उनके पूर्ववर्ती कलाकारों को मिली है

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कल जितिश कल्लट का जन्मदिन था !  46 वर्षीय जितिश एक कामयाब भारतीय समकालीन कलाकार हैं, जो पेंटिंग, फोटोग्राफी, कोलाज, स्कल्प्चर, इंस्टॉलेशन तथा मल्टीमीडिया में काम करते हैं । कम उम्र में ही जितिश ने एक कलाकार के रूप में सफलता की जो सीढ़ियाँ चढ़ी हैं, वह चकित करती हैं । जितिश को युवा भारतीय कलाकारों के उस 'क्लब' के सदस्य के रूप में देखा/पहचाना जाता है, जो अपेक्षाकृत कम उम्र में ही कला बाजार के चहेते बन गए और जिस क्लब में सुबोध गुप्ता, अतुल डोडिया, टीवी संतोष, रकीब शॉ आदि हैं - और जिनके लिए देश/विदेश की ऑर्ट गैलरीज दिन/रात एक किए रहती हैं, और जिसकी बदौलत इनकी कलाकृतियों को मकबूल फिदा हुसेन, सैयद हैदर रज़ा, फ्रांसिस सूज़ा, रामकुमार आदि की कलाकृतियों से ऊँची कीमत मिलती है । भारत में नई दिल्ली की नेचर मोर्ते तथा मुंबई की चमौल्ड प्रेस्कॉट रोड गैलरी; फ्रांस व बेल्जियम में गैलरी डेनियल टेम्प्लोन तथा बर्लिन में अर्न्ड गैलरी जितिश के काम की मार्केटिंग करती हैं । मुंबई में रहने और काम करने वाले जितिश इंडिया फाउंडेशन फॉर द ऑर्ट्स के ट्रस्टी हैं । 2014 में आयोजित हुए कोच्ची-मुज़िरिस बिएनाले

कोरोना वायरस के प्रकोप के चलते पैदा हुई समस्याओं और उनसे निपटने की कोशिशों ने गैलरीज प्रबंधकों व कला क्षेत्र के अन्य कारोबारियों को अच्छे नतीजे तो दिए हैं, लेकिन उससे कला बाजार की डायनामिक्स बदलने के संकेत भी मिल रहे हैं

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कोरोना वायरस के प्रकोप के चलते बने हालात कला जगत को झटका देने वाले तथा उभरते कलाकारों के भविष्य को असुरक्षित करने व असमंजस में डालने वाले भले दिख रहे हों, लेकिन व्यावसायिक ऑर्ट गैलरीज तथा कला के अन्य कारोबारियों के लिए कोई बहुत बुरे साबित नहीं रहे हैं । ऑर्ट गैलरीज तथा कला संस्थाओं को झटके जरूर लगे हैं, और उन्हें अपने महत्त्वाकांक्षी व प्रमुख आयोजनों को रद्द करने के लिए मजबूर होना पड़ा है, लेकिन लॉकडाउन के दौरान भी बड़ी व्यावसायिक भारतीय ऑर्ट गैलरीज ने कलाकृतियों की ठीकठाक बिक्री की है । डीएजी गैलरी, जो पहले देहली ऑर्ट गैलरी के नाम से जानी/पहचानी जाती थी, द्वारा लॉकडाउन के दौरान 50 से अधिक कलाकृतियाँ बेचे जाने की सूचना है । लेटीट्यूड 28 गैलरी की प्रिंट्स की ऑनलाइन प्रदर्शनी में भी कई काम बिकने की चर्चा है । वर्चुअल स्पेस में अभी चल रही समूह प्रदर्शनी में एक्सपेरीमेंटर गैलरी के चार काम बिकने की जानकारी है । खास बात यह है कि लॉकडाउन के दौरान बिकी पेंटिंग्स और प्रिंट्स के दाम भी ठीकठाक ही मिले हैं । इसी से, गैलरीज के प्रबंधकों और कला कारोबारियों को विश्वास हो चला है कि कोरोना वायरस के

कला की कोई औपचारिक शिक्षा प्राप्त न कर पाने की कमी को रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपने लिये एक अवसर में बदल दिया और रंग व रेखाओं की अभिव्यक्ति में उन्होंने नये और आवेगपूर्ण प्रयोग किए

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रवीन्द्रनाथ टैगोर यदि आज जीवित होते तो अपना 159वाँ जन्मदिन मना रहे होते । 7 मई 1861 को जन्मे रवीन्द्रनाथ ने अस्सी वर्ष की उम्र पाई थी । 7 अगस्त 1941 को अंतिम साँस लेने से पहले एक हजार से ज्यादा कविताओं, दो हजार से ज्यादा गीतों, करीब दो दर्जन नाटकों, आठ उपन्यासों, कहानियों के आठ से ज्यादा संकलनों, राजनीतिक-सामाजिक-धार्मिक-साहित्यिक विषयों पर लिखे तमाम लेखों की रचना करने वाले रवीन्द्रनाथ टैगोर को जानने वाले लोगों में बहुत कम लोगों को यह पता होगा कि उन्होंने करीब 2500 पेंटिंग्स व स्केचेज भी बनाए हैं, जिनमें से 1500 से कुछ ज्यादा शांतिनिकेतन स्थित विश्व भारती विश्वविधालय के संग्रहालय में देखे जा सकते हैं । वर्ष 1913 में 52 वर्ष की उम्र में साहित्य के लिये नोबेल पुरुस्कार प्राप्त करने वाले रवीन्द्रनाथ के चित्रों की पहली प्रदर्शनी वर्ष 1930 में जब हुई थी, तब वह 69 वर्ष के थे । दिलचस्प संयोग है कि 90 वर्ष पहले पेरिस में हुई रवीन्द्रनाथ के चित्रों की यह पहली प्रदर्शनी इन्हीं दिनों हुई थी । 5 मई से 19 मई 1930 के बीच हुई प्रदर्शनी की इतनी जोरदार चर्चा हुई कि इसके तुरंत बाद यह प्रदर्शनी कई यू

कला बाजार में बड़ी पूँजी के बल पर ऑर्ट फेयर्स ने ऑर्ट गैलरीज को क्या ठीक उसी तरह से समर्पण करने के लिए मजबूर नहीं कर दिया है, जैसे कि ऑर्ट गैलरीज ने कलाकारों को कर दिया था ?

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कला जगत और कला बाजार में पूँजी के बढ़ते प्रवाह ने पहले कलाकारों को गैलरीज के सामने समर्पण करने के लिए मजबूर बनाया और अब गैलरीज को कला मेलों के सामने निरीह बना दिया है ।   इसके बिलकुल नए उदाहरण हाल ही में दिल्ली में आयोजित हुए इंडिया ऑर्ट फेयर और आज मनीला में उद्घाटित हुए ऑर्ट फेयर फिलीपींस से जुड़े प्रसंग में देखने को मिले । इंडिया ऑर्ट फेयर में इटालियन दूतावास साँस्कृतिक केंद्र के बूथ पर फेयर के स्टॉफ ने कलाकारों के साथ बदतमीजी करते हुए बूथ की गतिविधियों को रोक दिया तथा उसे बंद करवा दिया, लेकिन फेयर में भाग लेने वाली गैलरीज ने फेयर के आयोजकों के इस कला व कलाकार विरोधी रवैये पर चूँ तक नहीं की और बदतमीजी का शिकार होने वाले कलाकार अलग-थलग पड़ गए । फिलीपींस की राजधानी मनीला में तो और भी 'गजब' हुआ ।   ऑर्ट फेयर फिलीपींस के आयोजकों की हरकतों से निराश/परेशान हो कर मनीला की दस बड़ी ऑर्ट गैलरीज ने ऑर्ट फेयर फिलीपींस के इस वर्ष के आयोजन का बहिष्कार करने की घोषणा की तथा 'एएलटी फिलीपींस' नाम से पिछले सप्ताह एक अलग तीन दिवसीय कला मेला आयोजित किया । लेकिन इसका ऑर्ट फेयर फिलीपींस पर

इंडिया ऑर्ट फेयर में इटालियन दूतावास सांस्कृतिक केंद्र के बूथ पर कलाकारों के साथ बदतमीजी करते हुए बूथ की गतिविधियों को रोक देने और उसे बंद करवा देने की मनमानी कार्रवाई करके फेयर की डायरेक्टर जगदीप जगपाल ने वास्तव में अपने कला और कलाकार विरोधी रवैये को ही प्रदर्शित किया है

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इंडिया ऑर्ट फेयर के समापन से कुछ पहले इटालियन दूतावास सांस्कृतिक केंद्र के बूथ पर जो हुआ, वह इंडिया ऑर्ट फेयर के पदाधिकारियों तथा डायरेक्टर जगदीप जगपाल की साख को धूल में मिला देने के लिए काफी है ।  इस घटना ने दिखाया/बताया है कि कला को लेकर बड़ी बड़ी बातें करने वाले आयोजकों के लिए न तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का कोई मतलब है, और न उनकी सोच व उनके व्यवहार में कलाकारों के प्रति कोई सम्मान है । उल्लेखनीय है कि इटालियन दूतावास सांस्कृतिक केंद्र के बूथ पर पहले ही दिन से लाइव कार्यक्रम चल रहे थे,  जिनमें भारतीय महिलाओं के संघर्षों व उनकी जिजीविषा को सौंदर्य, प्रेम, स्नेह, करुणा जैसे रूपों में अभिव्यक्त करने वाली कविताएँ पढ़ीं जा रही थीं; और एक कम्युनिटी प्रोजेक्ट के तहत आम महिलाओं द्वारा बनाये गए चित्रों को प्रदर्शित किया जा रहा था ।  मैना मुखर्जी ने इस आयोजन को क्यूरेट किया था । बूथ पर कई बार बताया गया था कि यह आयोजन भारतीय महिलाओं से संबद्ध है, और इस आयोजन का उद्देश्य भारतीय महिलाओं के लचीलेपन व दृढ़ता के साथ एकता व समन्वय प्रकट करना है ।  चारों दिन इस बूथ पर होने वाले कार्यक्रमों में लोगों

अंतर्राष्ट्रीय कला जगत व बाजार में खासी पहचान व धाक रखने वाले एमसीएच ग्रुप के इंडिया ऑर्ट फेयर से नाता तोड़ लेने के चलते बड़ी विदेशी गैलरीज तथा विदेशी मीडिया इंडिया ऑर्ट फेयर के इस बार के आयोजन से दूरी बनाती दिख रही हैं

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इंडिया ऑर्ट फेयर के 30 जनवरी से 2 फरवरी के बीच दिल्ली में होने जा रहे 12वें संस्करण को लेकर विदेशी मीडिया, खासकर कला और कला बाजार से संबद्ध मीडिया द्वारा दिखाए जा रहे उदासीन रवैये के चलते इस बार वैसी गहमागहमी नहीं दिखाई दे रही है, जैसी पिछले संस्करणों को लेकर दिखती रही है ।  इसे इंडिया ऑर्ट फेयर की आयोजक कंपनी सेवेंथ प्लान नेटवर्क्स प्राइवेट लिमिटेड में बड़ी इक्विटी हिस्सेदारी रखने वाले एमसीएच ग्रुप के अलग हो जाने के प्रतिकूल प्रभाव के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । स्विट्ज़रलैंड के एमसीएच ग्रुप की अंतर्राष्ट्रीय कला जगत व बाजार में खासी धाक है, और इसके फैसले तथा इसके 'इशारे' कला जगत व बाजार को तरह तरह से प्रभावित करते हैं । दरअसल प्रख्यात तथा दुनिया के बड़े कला मेलों में गिने जाने वाले 'ऑर्ट बेजल' के आयोजन से जुड़े होने के कारण एमसीएच ग्रुप को यह हैसियत प्राप्त है ।  इसीलिए एमसीएच ग्रुप ने जब करीब तीन वर्ष पहले इंडिया ऑर्ट फेयर में करीब 65 प्रतिशत की बड़ी इक्विटी हिस्सेदारी खरीदी थी, तब अचानक से विश्व कला बाजार में इंडिया ऑर्ट फेयर की 'हैसियत' बढ़ गई थी । इंडिया

सलमान तूर की कला

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मुझे क़तई यह इल्म नहीं था कि नेचर मोर्ते गैलरी मुझे इतने अनोखे आश्चर्य से भर देगी । दरअसल करीब साढ़े तीन वर्ष पहले न्यूयॉर्क में एकॉन गैलरी में जब पहली बार मैंने न्यूयॉर्क में रह रहे पाकिस्तानी चित्रकार सलमान तूर की पेंटिंग्स को देखा था, तब मैंने यह नहीं सोचा था कि उनकी पेंटिंग्स मुझे दिल्ली में भी देखने को मिल सकेंगी ।  इसीलिए नेचर मोर्ते गैलरी में सलमान तूर की पेंटिंग्स की एकल प्रदर्शनी को देखा, तो स्वाभाविक ही मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा । हालाँकि  इंडिया ऑर्ट फेयर के पिछले दिल्ली संस्करण में एकॉन गैलरी के सौजन्य से उनकी दो/तीन पेंटिंग्स  देखने का मौका मिला था । लेकिन नेचर मोर्ते में तो सलमान तूर की सृजनात्मकता का खजाना खुला मिला । दिल्ली ही नहीं, भारत में उनके चित्रों की यह पहली एकल प्रदर्शनी है । उनकी कुछेक पेंटिंग्स हालाँकि इंडिया ऑर्ट फेयर से पहले कोच्ची-मुज़िरिस बिएनाले में भी प्रदर्शित चुकी हैं ।  सलमान तूर के चित्रों के केंद्र में मनुष्य है, खासकर युवा मनुष्य - जीवन और रोजमर्रा के क्रियाकलापों में संलग्न, और इसलिए उनके चित्रों में प्रायः एक से अधिक ही मनुष्य दिखते है