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सैयद हैदर रज़ा की पेंटिंग्स पर 'फेक' होने के आरोपों की लड़ाई में रज़ा फाउंडेशन के एक पक्ष बन जाने के कारण लग रहा है कि यह लड़ाई अभी लंबी चलेगी और अलग अलग रूपों में सामने आती रहेगी

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सैयद हैदर रज़ा की पेंटिग्स के 'ख़जाने' में नकली माल होने के आरोप/प्रत्यारोप लगने के पीछे उनकी पेंटिंग्स के बाज़ार पर कब्ज़ा जमाने की 'लड़ाई' को ही देखा/पहचाना जा रहा है । बड़े नामचीन चित्रकारों के काम के 'फेक' होने के आरोप अक्सर लगते रहते हैं, और यह आरोप कभी सच होते हैं तो कभी गैलरीज की व्यापारिक प्रतिस्पर्धा के नतीजे से भी उपजते हैं । सैयद हैदर रज़ा के काम को लेकर अभी हाल ही में जो विवाद पैदा हुए हैं, उन्हें भी रज़ा के काम के बाजार पर एकाधिकार जमाने की लड़ाई के रूप में देखा जा रहा है । रज़ा की पेंटिंग्स के 'फेक' होने के मामले में जिस तरह से रज़ा फाउंडेशन एक पक्ष बन गया है, उसे देखते हुए लगता है कि यह लड़ाई अभी लंबी चलेगी । उल्लेखनीय है कि रज़ा की पेंटिंग्स की इन दिनों मुंबई और दिल्ली में प्रदर्शनी चल रही हैं । मुंबई में पीरामल म्यूजियम ऑफ ऑर्ट ने अपने संग्रहालय में रज़ा की पेंटिंग्स प्रदर्शित की हैं, जबकि दिल्ली में रज़ा फाउंडेशन ने श्रीधारणी कला दीर्घा में उनके चित्रों को प्रदर्शित किया है । खास बात यह है कि मुंबई में उनके बिलकुल आरंभिक चित्रों स...

इटली के पर्लेमो से लेकर दिल्ली व मुंबई में हाल के दिनों में कला को लेकर जो हुआ है, वह अपनी संरचना और व्यवस्था में कोई बहुत नया या अनोखा न होते हुए भी उम्मीद जगाने तथा रास्ता दिखाने वाला जरूर है

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पिछले पाँच-छह दशकों में कला की दुनिया में परंपरागत माध्यमों से इतर नए माध्यमों का जो विस्तार हुआ है, और उसमें तकनीकी विकास ने जो योगदान दिया है - उसने कला के विश्लेषण व अवलोकन के प्रतिमानों को तो अस्थिर किया ही है, कला के देखने/समझने के पूरे फ्रेम को भी बदल दिया है । चाक्षुक कला में नित नए होते प्रयोगों ने दर्शकों और कला-प्रेक्षकों को लगातार चमत्कृत व अचम्भित किया है, जिसका नकारात्मक प्रभाव भी पड़ा है और वह यह कि कला को जरूरत के रूप में देखने की बजाये प्रदर्शन और फैशन की चीज मान लिया गया; और कला को सनसनी फैलाने का जरिया मान लेने की प्रवृत्ति बढ़ी । इस वजह से कला की समाज से दूरी बनती व बढ़ती गई । इस कारण से उन कलाकारों के सामने दिक्कत आई जो दर्शकों व कला-प्रेक्षकों से संवाद बनाना/करना चाहते हैं; और सच यह भी है कि अलग अलग कारणों से हर कलाकार ही संवाद बनाना चाहता है । चूँकि हर समस्या, अपने हल के प्रयासों की प्रेरणास्रोत भी होती है - इसलिए समस्याएँ पैदा हुईं, तो उनके हल के प्रयास भी तेज हुए और इन प्रयासों को इंस्टालेशन व पब्लिक ऑर्ट जैसे कला-रूपों ने भी बढ़ावा दिया । हाल ही के दिनों म...