Posts

Showing posts with the label Jagdish Swaminathan

इटली के पर्लेमो से लेकर दिल्ली व मुंबई में हाल के दिनों में कला को लेकर जो हुआ है, वह अपनी संरचना और व्यवस्था में कोई बहुत नया या अनोखा न होते हुए भी उम्मीद जगाने तथा रास्ता दिखाने वाला जरूर है

Image
पिछले पाँच-छह दशकों में कला की दुनिया में परंपरागत माध्यमों से इतर नए माध्यमों का जो विस्तार हुआ है, और उसमें तकनीकी विकास ने जो योगदान दिया है - उसने कला के विश्लेषण व अवलोकन के प्रतिमानों को तो अस्थिर किया ही है, कला के देखने/समझने के पूरे फ्रेम को भी बदल दिया है । चाक्षुक कला में नित नए होते प्रयोगों ने दर्शकों और कला-प्रेक्षकों को लगातार चमत्कृत व अचम्भित किया है, जिसका नकारात्मक प्रभाव भी पड़ा है और वह यह कि कला को जरूरत के रूप में देखने की बजाये प्रदर्शन और फैशन की चीज मान लिया गया; और कला को सनसनी फैलाने का जरिया मान लेने की प्रवृत्ति बढ़ी । इस वजह से कला की समाज से दूरी बनती व बढ़ती गई । इस कारण से उन कलाकारों के सामने दिक्कत आई जो दर्शकों व कला-प्रेक्षकों से संवाद बनाना/करना चाहते हैं; और सच यह भी है कि अलग अलग कारणों से हर कलाकार ही संवाद बनाना चाहता है । चूँकि हर समस्या, अपने हल के प्रयासों की प्रेरणास्रोत भी होती है - इसलिए समस्याएँ पैदा हुईं, तो उनके हल के प्रयास भी तेज हुए और इन प्रयासों को इंस्टालेशन व पब्लिक ऑर्ट जैसे कला-रूपों ने भी बढ़ावा दिया । हाल ही के दिनों म...

जगदीश स्वामीनाथन 19 वर्षों से हमारे बीच नहीं हैं लेकिन हमारे सौभाग्य से उनकी पेंटिंग्स और उनकी कविताएँ हमारे लिए उपलब्ध हैं

Image
19 वर्ष पहले, वर्ष 1994 के आज के दिन तक आधुनिक भारतीय चित्रकला को उसके वातावरण से जोड़ने के महत्पूर्ण काम को अंजाम देने वाले जगदीश स्वामीनाथन (जून 21,1928 - अप्रैल 25,1994) हमारे बीच मौजूद थे | इस तथ्य को याद करना इसलिए भी रोमांचित करता है क्योंकि वह उन थोड़े से कलाकर्मियों में से हैं जो बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मनुष्य की अंतरात्मा और कला-माध्यम के प्रश्नों को अटूट देखने में समर्थ हैं और जिनका कुछ भी सोचा-कहा-किया हुआ हमारे लिए आज भी गहरा अर्थ रखता है | समकालीन कला संसार में एक विचारोत्तेजक 'घटना' के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले जगदीश स्वामीनाथन 19 वर्षों से हमारे बीच नहीं हैं लेकिन हमारे सौभाग्य से उनकी पेंटिंग्स और उनकी कविताएँ हमारे लिए उपलब्ध हैं, जिनमें उनकी अनुपस्थिति में भी उनकी उपस्थिति को हम महसूस कर सकते हैं | कृष्ण बलदेव वैद के शब्द उनकी उपस्थिति को जैसे सजीव बनाते हैं : 'स्वामी एक ऐसा आधुनिकतावादी था जिसने आदिवासी कला को भोपाल स्थित भारत भवन...