कला की कोई औपचारिक शिक्षा प्राप्त न कर पाने की कमी को रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपने लिये एक अवसर में बदल दिया और रंग व रेखाओं की अभिव्यक्ति में उन्होंने नये और आवेगपूर्ण प्रयोग किए

रवीन्द्रनाथ टैगोर यदि आज जीवित होते तो अपना 159वाँ जन्मदिन मना रहे होते । 7 मई 1861 को जन्मे रवीन्द्रनाथ ने अस्सी वर्ष की उम्र पाई थी । 7 अगस्त 1941 को अंतिम साँस लेने से पहले एक हजार से ज्यादा कविताओं, दो हजार से ज्यादा गीतों, करीब दो दर्जन नाटकों, आठ उपन्यासों, कहानियों के आठ से ज्यादा संकलनों, राजनीतिक-सामाजिक-धार्मिक-साहित्यिक विषयों पर लिखे तमाम लेखों की रचना करने वाले रवीन्द्रनाथ टैगोर को जानने वाले लोगों में बहुत कम लोगों को यह पता होगा कि उन्होंने करीब 2500 पेंटिंग्स व स्केचेज भी बनाए हैं, जिनमें से 1500 से कुछ ज्यादा शांतिनिकेतन स्थित विश्व भारती विश्वविधालय के संग्रहालय में देखे जा सकते हैं । वर्ष 1913 में 52 वर्ष की उम्र में साहित्य के लिये नोबेल पुरुस्कार प्राप्त करने वाले रवीन्द्रनाथ के चित्रों की पहली प्रदर्शनी वर्ष 1930 में जब हुई थी, तब वह 69 वर्ष के थे । दिलचस्प संयोग है कि 90 वर्ष पहले पेरिस में हुई रवीन्द्रनाथ के चित्रों की यह पहली प्रदर्शनी इन्हीं दिनों हुई थी । 5 मई से 19 मई 1930 के बीच हुई प्रदर्शनी की इतनी जोरदार चर्चा हुई कि इसके तुरंत बाद यह प्रदर्शनी कई यूरोपीय देशों में हुई । भारत में उनके चित्रों की पहली प्रदर्शनी पेरिस में हुई प्रदर्शनी के ठीक एक वर्ष बाद, वर्ष 1931 में कलकत्ता में हुई ।


रवीन्द्रनाथ में चित्रकला के प्रति यूं तो बचपन से ही उत्सुकता का भाव था । अपने बड़े भाई ज्योतिरिन्द्रनाथ को स्केच बनाते देख वह ड्राइंग के प्रति आकर्षित व प्रेरित हुए थे और बचपन में उन्होंने कुछेक ड्राइंग व स्केच बनाए भी थे । उन दिनों उन्हें चूंकि सभी कुछ आकर्षित करता था और अपनी बहुआयामी प्रतिभा के कारण वह अभिव्यक्ति के सभी माध्यमों में सक्रिय हो रहे थे, इसलिए चित्रकला की औपचारिक शिक्षा वह नहीं ले सके । इसके बावजूद चित्रकला के प्रति अपनी अदम्य आकांक्षा से वह मुक्त नहीं हो सके और रेखांकन व चित्रांकन, रंग और रूप उनको हमेशा ही सहज भाव से उल्लसित तथा उद्वेलित करते रहे । इसी का नतीजा रहा कि जब भी और जैसे भी उनको यह अंतर्प्रेरणा मिली कि वह चित्रों के माध्यम से अपनी गहनतम अनुभूतियों को बहिर्गमित कर सकते हैं, उन्होंने निहायत सरलता व सुगमता से अपना मंतव्य पूरा कर लिया । चित्रकला के संदर्भ में उनकी सृजनात्मक ऊर्जा इतने तीव्र आवेगात्मक रूप में अवतरित हुई कि उसने उन्हें जानने वालों के साथ-साथ खुद उन्हें भी चकित और स्तंभित किया । उन्होंने कहा भी है कि चित्रकला के लिये उन्हें जो मौका मिला वह परमपिता से उन्हें अतिरिक्त जीवन के रूप में मिला । रवीन्द्रनाथ ने कला की कोई औपचारिक शिक्षा तो प्राप्त नहीं की थी, लेकिन अपनी इस कमी को उन्होंने अपने लिये एक अवसर में बदल दिया और रंग व रेखाओं की अभिव्यक्ति में उन्होंने नये और अभिनव आवेगपूर्ण प्रयोग किए । यह प्रयोग वह इसलिए भी कर सके क्योंकि बंगाल चित्रशैली से वह नितांत अपरिचित व अछूते ही थे । इस अछूतेपन के कारण ही वह बंगाल चित्रशैली को उसकी जड़ और रूढ़ मान्यताओं से मोक्ष दिलवा सके । यह काम रवीन्द्रनाथ जैसी प्रतिभा के लिये ही संभव था । उनके इन्हीं आवेगपूर्ण प्रयोगों के चलते रवीन्द्रनाथ की कला-भाषा का त्वरित किंतु क्रमिक विकास हुआ । रवीन्द्रनाथ ने अपने अंतर्जगत को आलोकित करने के लिये जिस समय चित्रकला को चुना था, उस समय तक वह एक महान कवि और प्रखर दार्शनिक के रूप में अपनी प्रभावी पहचान बना चुके थे । जाहिर है कि एक कवि और दार्शनिक के रूप में अपना सर्वश्रेष्ठ दे देने के बाद भी उनके अंतर्जगत में संवेगों का खजाना अभी बाकी था जो रूपायित होने के लिये एक भिन्न माध्यम पर सवार होने का इंतजार कर रहा था । रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इस भिन्न माध्यम के रूप में चित्रकला को पहचाना तथा पकड़ा और अपनी प्रतिभा से कला-जगत को अनेकानेक अमूल्य निधियाँ प्रदान कीं ।


रवीन्द्रनाथ के चित्रों से स्थापित कृतियों जैसी परिपूर्णता की मांग करना अन्याय ही होगा, क्योंकि उनकी चित्र-कृतियाँ वृद्वावस्था के तथा एक ऐसे हाथ के काम हैं जो कलागत अनुशासन से सर्वथा अनभिज्ञ था । इसका अभाव उनकी विशेषता का अंग है, जिसमें विसंगति, दृष्टि व रूपरंग की न होकर, रूपरंग और प्रस्तुति की है । यह अभाव स्वयं रूपभाषा में ही एक प्रकार की कारुणिकता उत्पन्न करता है । अपने काम की समस्त मांगें पूरी कर रवीन्द्रनाथ जब काम की तन्मयता से बाहर आते थे तब वह काम की प्रासंगिकता पर सोचते निश्चय ही थे । फिर भी वह जो काम कर रहे थे वह उन्हें करना ही था, क्योंकि मनोवेगों की अनिवार्यता ने उनके हाथ की शक्ति-सीमाओं पर अधिकार कर लिया था । इसके चलते रवीन्द्रनाथ रचना प्रक्रिया की लय और तर्कसंगति के अनुकूल काम करने को 'विवश' थे । इस पूरी प्रक्रिया में वह जैसे अपने भीतर से दिशानिर्देशित थे; उन्होंने इस भीतरी निर्देशन को मानते हुए काम में हाथ लगाया, मनोवेग को एक रूपाकार में बदला और एक रूपरंग दे दिया । चित्र बन जाने पर ख़ुद रवीन्द्रनाथ भी चकित होते थे । चित्र में यद्यपि पूर्णता का अभाव रहता, पर वह पूर्ण प्रतीत होती । शायद यही कारण रहा होगा कि वह अपनी किसी चित्रकृति का शीर्षक न तो दे पाए और न ही उन्होंने दिया ।



रवीन्द्रनाथ में सृजनशीलता का सीधा नाता उनके व्यक्तिगत आत्मसंलाप से था । वह वही चित्रित कर रहे थे जो वह स्वयं थे । उनकी रचनात्मक मेधा और उनके आत्म-प्रकाश के बीच में कोई छाया न थी । समस्त जीवन और उसकी क्षणभंगुरता एवं निस्सारता का भाव उनकी कृतियों में देखा जा सकता है, साथ ही जीवन और आकांक्षा के अविभक्त, स्पंदनशील रूपाकार को भी ये चित्र निरुपित करते हैं । यही उनकी कविता का भी मुख्य स्वर है । रवीन्द्रनाथ के चित्रों में भौतिकता और ऐंद्रियता की विशिष्टताएं अमूर्त सौंदर्य के उन्हीं साहित्यिक सूत्रों के अधीन हैं जो स्वयं उनके काव्य को मनोरमता और भव्यता की कल्पनाओं से परिपुष्ट करती हैं । रूपों और भंगिमाओं का विस्तार अभिव्यक्ति द्वारा निर्दिष्ट होता है और जीवन की चलती-फिरती दृश्यावली इस प्रमुख धारणा के अधीन है कि जीवन की प्रत्येक घटना एक साथ मानवीय और देवीय है । रवीन्द्रनाथ की कला अपनी अकृत्रिमता, करुणा और मनोहरता से हमें उद्वीप्त करती है ।  

Comments

  1. रवींद्रनाथ टैगोर ने 67 साल की उम्र में पेंटिंग्स शुरू की , उनके चित्रशैली में अलग ही अनोखापन विद्यमान है।

    ReplyDelete
  2. रवींद्रनाथ टैगोर ने 67 साल की उम्र में पेंटिंग्स शुरू की , उनके चित्रशैली में अलग ही अनोखापन विद्यमान है।

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

विवान सुंदरम को समकालीन भारतीय कला की हत्या का जिम्मेदार ठहरा कर जॉनी एमएल समकालीन भारतीय कला के दूसरे प्रमुख कलाकारों को भी अपमानित करने का काम नहीं कर रहे हैं क्या ?

प्रख्यात चित्रकार गोपी गजवानी की फिल्मों में अभिव्यक्त 'स्थितियाँ' हमारे 'देखने' को बहु-आयाम में देखना बनाती हैं

कला बाजार में जोरदार सफलता पाने वाले जितिश कल्लट तथा उनके जैसे कामयाब कलाकारों की कलाप्रेमियों के बीच वैसी पहचान और प्रतिष्ठा आखिर नहीं बन पाई है, जैसी पहचान व प्रतिष्ठा उनके पूर्ववर्ती कलाकारों को मिली है