Posts

Showing posts with the label The Social History of Art and Literature

निर्मल वर्मा की कुछ बातें

Image
'एक कलाकृति का जादू और मर्म और रहस्य  उसकी नितांत निजी, विशिष्ट बुनावट में रहता है ।'   'कलाकृति की सार्थकता इसी में है कि  वह हमारी अंतर्दृष्टि को अधिक व्यापक और संवेदनशील बना सके ।  उस व्यापक दृष्टि के सहारे हम अपना जीवन-दर्शन  खुद खोज सकें ।'    'पेंटिंग में रंग अपने में कोई महत्त्व नहीं रखता,  जब तक वह अपनी उचित जगह,  सही 'स्पेस' से नहीं बोलता ।'     'आज यदि रचनाएँ हमें संपूर्णता या कृतज्ञता का  बोध नहीं करा पातीं  तो इसलिए कि कला ने अपनी स्वतंत्रता की  गरिमामय प्रतिज्ञा भूलकर  अपने को समय के फार्मूलों, मन्त्रों और फैशनों में बाँध लिया है ।'     'जिसे आप 'क्रियेटिविटी' कहते हैं  वह इस बात में निहित होती है कि जो चीज दिखाई देती है  उसका सत्व उस चीज के भीतर छुपा है  और हमारी 'क्रियेटिविटी' इससे उद्धेलित होती है कि  इस छिपे हुए सत्य को बाहर के यथार्थ में रूपांतरित करे ।   इसीलिए एक कवि शब्दों को लेता है और उन्हें...

आर्नल्ड हाउजर का कहना है कि 'प्रत्येक कृति और कृति का प्रत्येक अंग मौलिकता और रूढ़ि, नवीनता और परंपरा के बीच टकराव के परिणामस्वरूप आकार ग्रहण करता है'

Image
विख्यात हंगेरियन कला इतिहासकार आर्नल्ड हाउजर  ने सामाजिक ताने-बाने के कला पर पड़ने वाले प्रभावों का न सिर्फ गंभीर विवेचन ही किया है, बल्कि कला को समझने व व्याख्यायित करने के लिए उसे जरूरी अवयव  के रूप में भी देखा/पहचाना है । 'द सोशल हिस्ट्री ऑफ ऑर्ट एंड लिटरेचर' शीर्षक उनकी किताब कला को इतिहास, मनोविज्ञान और समाजशास्त्र के नजरिए से पहचानने/परखने के जो तर्क देती है - उसने कला संबंधी चिंतनधारा को ही  बदल देने का काम किया है । इसके बाद आईं उनकी  'द फिलॉसिफी ऑफ ऑर्ट हिस्ट्री' तथा  'द सोशियोलॉजी ऑफ ऑर्ट' शीर्षक किताबों ने तो  कला के रचनात्मक व समाजशास्त्रीय प्रश्नों को लेकर  छिड़ी बहस में उत्तेजक हस्तक्षेप किया ।  उनकी और भी कई किताबें हैं ।  उनके समस्त लेखन में उन स्रोतों की ओर भी संकेत मिलते हैं  जहाँ से सार्थक रचनात्मकता की एक नई पहचान को  उभरने का अवसर मिलता है - दरअसल इसी कारण से  उनके लेखन को रचना और आलोचना, दोनों के मामले में  महत्ता मिली । 'द सोशल हिस्ट्री ऑफ ऑर्ट एंड लिटरेचर' के  एक प्...