'वैचारिकता की सक्रियता राग तेलंग की कविताओं को उल्लेखनीय बनाती है'


'शब्द गुम हो जाने के खतरे', 'मिट्टी में नमी की तरह', 'बाज़ार से बेदख़ल', 'कहीं किसी जगह', 'कई चेहरों की एक आवाज', 'अंतर्यात्रा' के बाद 'कविता ही आदमी को बचायेगी' राग तेलंग का सातवाँ कविता संग्रह है जो अभी हाल ही में भोपाल के 'पहले पहल प्रकाशन' द्धारा प्रकाशित हुआ है । समकालीन भारतीय कला में अपनी विशेष पहचान रखने वाले चित्रकार देवीलाल पाटीदार की पेंटिंग को इस संग्रह के आवरण चित्र के रूप में लिया गया है । कुमार अंबुज को समर्पित इस संग्रह के आवरण के दूसरे छोर पर राग तेलंग की कविताओं को लेकर मुकेश मिश्र की संक्षिप्त टिप्पणी प्रकशित की गई है । यहाँ उक्त टिप्पणी के साथ इसी संग्रह की चार कविताओं को प्रस्तुत किया जा रहा है :
 
"कविता और राजनीति के रिश्ते पर विचार करते हुए मैं राग तेलंग की सभी कविताओं को एक बार फिर से पढ़ गया, तो मैंने पाया कि व्यापक अर्थ में उनकी सभी कविताएँ राजनीतिक ही हैं । हालाँकि उनकी किसी भी कविता में कोई राजनीतिक संदर्भ साफ तौर पर नज़र नहीं आता है । राग तेलंग की कविताओं को मैं इस कारण ही राजनीतिक मान रहा हूँ, क्योंकि वह राजनीतिक संदर्भों को व्यक्त करती और उनसे साक्षात्कार कराती दिखती हैं । राग तेलंग को राजनीतिक संदर्भों का गहरा और सही बोध है । कविता राजनीति से दो स्तरों पर साक्षात्कार करती/कराती है : एक घटना के स्तर पर और दूसरे अभिप्रायों के स्तर पर । साक्षात्कार के स्तर ही कविता के स्तर हैं । यह स्तर बहुत-कुछ कवि के मन की बनावट और समय के दबाव पर निर्भर करते हैं । वास्तव में कवि के लिए राजनीति एक स्तर पर मनुष्य की हालत का साक्षात्कार है, तो एक अन्य स्तर पर इस साक्षात्कार का साधन भी । कोई भी सार्थक और समर्थ कविता किसी-न-किसी स्तर पर परिवेश से मनुष्य के संबंध को, मनुष्य से मनुष्य के संबंध को, मनुष्य के अपने आप से संबंध को नए सिरे से परिभाषित करती है जो राजनीति से बचकर और बाहर रहकर नहीं किया जा सकता ।
ऋग्वेद और महाभारत से लगाकर शूद्रक, विशाखदत्त, चंदबरदाई और भारतेंदु तक न जाने कितने नाम गिनाये जा सकते हैं जो अपनी रचनाओं में राजनीति को किसी न किसी रूप में अभिव्यक्त करते रहे हैं । मजे की बात यह है कि हर कोई मानता है कि लेखक का कर्तव्य है कि वह सदा अपने आधारभूत सत्य का उद्घाटन करता रहे, और विकृति के पीछे छिपे सत्य का अविष्कार करता रहे । ऐसा करते हुए कोई 'राजनीति' से भला कैसे बच सकता है ?
राग तेलंग की कविताओं में वैचारिकता की जो सक्रियता है, वह इन कविताओं को उल्लेखनीय बनाती है । राग तेलंग की इन कविताओं में राजनीतिक संदर्भ तो व्यक्त होता है, लेकिन वह यहाँ इस स्वाभाविकता से व्यक्त होता है कि विचार और संवेदना का पारंपरिक द्धेत यहाँ व्यर्थ हो जाता है ।"

।। उनके लिए संबोधन से मेरी असहमति है ।।
 
बिना पागल हुए आप दुनिया को नहीं समझ सकते
कहने का मतलब
दुनिया को समझ चुके लोग
इस दुनिया से बेदखल कर दिए जाते हैं
पागल करार दिए जाकर

समूह में जब बैठते हैं वे
तब दुनिया की समझ पर तरस खाते हैं
मगर दुनिया के फतवे को स्वीकारते नहीं अंत तक

पागलपन समझ की इंतेहा है

समझने की क्रिया के दौरान संसाधित होने वाले तमाम आँकड़े
अनंत से साक्षात् करके जब तक लौटते हैं
दुनिया बहुत पीछे रह जाती है और
तब तक अजनबी हो चुके होते हैं वे
जिन्हें पागल कहकर
फिर अपना काम बदस्तूर चलाती है ये दुनिया

थोड़े-थोड़े दीवाने हम सब भी हुए हैं कभी
कभी स्वर्ण मृग के फेर में
कभी नीले चाँद के रोज़
कभी बिना साज़ के झूमते हुए अकेले में

जिन्होंने समझौते नहीं किए
जो रोकर
हल्का न कर पाए अपना मन
उन पर डाल दिया
दुनिया ने अपना सारा बोझ

जिन्होंने किया इसका विरोध
जो खड़े दिखे खिलाफ़त में
जिन्होंने चुनौतियाँ उछालीं
जिन्होंने सारे फैसले दिल से किए
टूटकर चाहा अपनों को
जुनूं में किया सब कुछ
वे ही हुए विस्थापित अपनी जमीन से

जहाँ पर
अब यह वैभव
यह जगमग
यह कलरव
दुनिया के अतिक्रमण के फलस्वरूप है

उन कुछ भोले लोगों के हक़ पर
जो जीना चाहते थे
कई मासूम और सच्चे अहसासों वाली ज़िंदगी ।

।। खून कैसे बनता है ।।

खून कैसे बनता है
इस विषय की मुझे जानकारी तो नहीं है
मगर खून कैसे बनता है इसका अहसास मुझे है

खून बनता है
पसीना बहाने से
मेहनत कर चुकने के बाद
चिड़ियों के साथ बैठकर सुस्ताने से
खून बनता है

एक वक्त ही सही अपनी कमाई की रोटी खाता हूँ
खून बनता है

मैं जब अपने आप पर या किसी पर विश्वास करता हूँ
मेरे भीतर खून बनता है

जब तुम भय से मुक्त हो जाते हो
खून बनता है
मैं तुम्हें देखता हूँ, छूता हूँ
फिर तुमसे हाथ मिलाकर विदा होता हूँ
खून बनता है

जरूरतमंद को खून देने की इच्छा के पहले
खून बनता है

एक प्यासे पौधे को पानी
मरीज को दवा
किसी को सहारा-सांत्वना
यहाँ तक कि दुआ देता हूँ
तो खून बनता है

साँस लेता हूँ
सुनता हूँ, चलता हूँ, दौड़ता हूँ
हुलसकर एक बच्चे को गोद में उठाता हूँ
खून बनता है

ठंडी चट्टान पर हाथ धरता हूँ
एक वटवृक्ष को निहारता हूँ
तितली के रंगों पर आश्चर्य करता हूँ
फिर आसमान की ओर तकता हूँ
खून बनता है

सच बोलता हूँ
खून बनता है

हाँ
ऐसे भी खून बनता है ।

।। बाकायदा पुरानी चीजों के खिलाफ ।।

सबसे पहले
दरकिनार किए गए वे लोग
जो पुरानी चीजों के हिमायती थे

रखते थे उन्हें सहेज-सहेज कर और
उनसे जुड़ी
अपनी स्मृतियों का बखान करते थकते नहीं थे

वे लोग जुनूनी थे
जिनके पास ऐसा आकाश होता था
जिसमें फालतू कही जाने वाली
पुरानी चीजों के लिए हर वक्त जगह होती थी

पुरानी चीजों के बने रहते
मुश्किल था नई चीजों का आना
इसलिए
पुरानी चीजों की जगह के आकार में बनाई गईं
उनसे ज्यादा कई-कई नई चीजों की जगहें
सो पहले पुराने लोगों की बातों की उपेक्षा की गई
फिर उनकी बारी आई
फिर धीरे-धीरे वे खुद ही दृश्य से हट गए
इससे पुरानी चीजों का होना
अप्रासंगिक सिद्ध हुआ स्वतः

ऐसी और भी सारी असुविधाएँ बेदखल की गईं
मसलन पुरानी चीजों के प्रति प्रेम
उनसे जुड़े लोगों के विश्वास व नेह के संबंध और
उनमें जा घुली मधुर समय की सांद्र गंध

भले दिखता हो यह सब सहज पर
जैसे ही ध्वंस हुआ
पुरानी चीजों की स्मृतियों का
वहाँ अपने-आप उग आए
नई चीजों के स्वप्न और आकांक्षाएँ

यह सब अनायास नहीं था
इसके लिए बाकायदा
पुरानी चीजों के खिलाफ
साजिशें रची गई थीं ।


।। बच्चों की खुशी हमारी खुशी है ।।

जब हम कहते हैं
बच्चों की खुशी हमारी खुशी है
उस सामने वाले से
जो हमारे यहाँ बैठने आया है
शायद अपना दुःख-दर्द बाँटने
तब हम अनकहे ही
बच्चों के भीतर पसर चुके
महंगे शौकों की बात कर रहे होते हैं 

बच्चों की खुशी
हमेशा से हमारी खुशी रही आई है
और आगे भी रहेगी
यानी तब तक
हमारा खुश होना स्थगित होता रहेगा

वह जो सामने बैठा है अभी
वह अपने मौन में व्यक्त कर रहा है
वही सब कुछ
जो बच्चों की खुशी के संबंध में
कहे आए वाक्य के गूढ़ार्थ में छुपा हुआ है
मगर वह है कि अंत तक नहीं खुलता
जाते-जाते वह भी
इतना कह गया
कुछ बातों के बीच
बच्चों की खुशी में अपनी खुशी है

घर-घर में
भेद भरी यह गांठ खुल तो जाती थी
मगर घर से बाहर निकलते ही
हमें बच्चों की उन खुशियों का ख्याल आता
तो हम चुप्पी साध लेते
अपनी सिर्फ अपनी खुशियों की बलि देकर ।

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